पाकिस्तान का बुरा हाल ! अगर ईरान और अमेरिका सीजफायर पर बातचीत फेल होती है तो पाकिस्तान का क्या हाल होगा?

ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर वार्ता में पाकिस्तान की अहम भूमिका

दिल्ली: मिडिल ईस्ट में भले ही अभी जंग आपको रुकी हुई दिखाई दे रही होगी लेकिन अब असली जंग तो अब शुरू हो रही है, जो गोली बारूद से नहीं बल्कि बातचीत से शुरू होगा जिसको संभालते संभालते पाकिस्तान की भी हालत खराब होने वाली है क्योंकि इस बातचीत में पाकिस्तान मीडीएटर बनाकर कार्य कर रहा है।

और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ इस बातचीत से खुद को एक शांतिदूत के तौर पर पूरी दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि कैसे पाकिस्तान की वजह से इतना भयानक युद्ध रुक गया लेकिन शायद शहबाज शरीफ इस ओवर कॉन्फिडेंट में खुद को और बड़ी मुश्किल में धकेल रहे हैं।

पाकिस्तान कैसे फंसेगा बुरी तरह से ?

पाकिस्तान का इस्लामाबाद इस समय एक हॉटस्पॉट जॉन बना हुआ है। जहां अब लड़ाई टेबल पर होगी दो ऐसे देश के बीच जहां एक चूक पर पाकिस्तान बली के बकरे की भांति कटेगा अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हो रहे इस बातचीत को जितना आसान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री समझ रहे हैं, यह उससे कई ज्यादा जोखिम भरा है। पाकिस्तान के लिए यह वार्ता किसी मिशन इंपॉसिबल से काम नहीं है जहां पर हालात सुधरने की चांस ना के बराबर और बिगड़ने की चांस 100% है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और सेवा प्रमुख आशिम मुनीर लगातार अपनी पेटी की कुर्सी बांधकर इस बातचीत को शांति और सफल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि इनको पता है कि एक गलती से पूरे पाकिस्तान का नाम मिट्टी में मिल सकता है, एक पाकिस्तानी एक्सपोर्ट का ही बोलना है कि पाकिस्तान इस बातचीत को सफल बनाने में अपनी पूरी पूंजी लगा दिया है। और अगर बातचीत नहीं बनती है तो पाकिस्तान का बुरा हाल और भी बत्तर से बत्तर हो जाएगा।

पाकिस्तान इस बातचीत को लेकर इस्लामाबाद के आसपास के सभी इलाकों को सील कर दिया है, सड़के पूरी तरह खाली करा दिया गया है। सुरक्षा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से हटकर पूरा इस बातचीत पर लगा दिया गया है, यह बातचीत जिस होटल में हो रहा है उसकी पूरी तरह से खाली कराकर सरकार के कब्जे में ले लिया गया है।

पाकिस्तान को सुरक्षा को लेकर बेहद चिंता बना हुआ है पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बाहरी असुरक्षा से कम और अपने देश की आतंकियों से ज्यादा घबरा रहे हैं। पाकिस्तान को पता है कि उसके यहां खुलेआम गोली चलना, बमं फोड़ना कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसे में यह तीन दिन की बातचीत में कोई चूक नहीं होनी चाहिए और इसलिए पाकिस्तान अपने देश की पूरी ताकत इस बातचीत के सुरक्षा में लगा दिया है।

पाकिस्तान क्यों चाहता है शांति का यह समझौता ?

पाकिस्तान के लिए यह समझौता केवल एक कूटनीतिक पहल नहीं है बल्कि यह इसकी सुरक्षा से भी जुडा हम मामला है। पाकिस्तान के एक्सपोर्ट का मानना है कि यह समझौता पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी है क्योंकि पाकिस्तान नहीं चाहता है, कि यह युद्ध लगातार आगे बढ़ता रहे पाकिस्तान को इस युद्ध से सबसे ज्यादा खतरा है पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर हालत पहले से ही नाजुक बना है और अगर यह हमला लगातार होता है तो पश्चिमी सीमा पर दबाव ज्यादा पड़ेगा जिसको संभालने के चक्कर में पाकिस्तान पूरी तरह बिखर जाएगा।

और इसी कारण से पाकिस्तान चाहता है कि यह युद्ध का मसाला दोनों देशों के बीच शांति के समझौते में बदल जाए ताकि जाहां दोनों देश युद्ध के जगह सांती का का परीचय दें

क्या पाकिस्तान की वजह से बातचीत सफल होगा ?

पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के शांति समझौते में अहम भूमिका तो निभा रहा है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि इसका सारा बात यह दोनों देश मान लेंगे या फिर पाकिस्तान के पास इतनी ताकत नहीं है कि यह अपने दम पर दोनों देशों को बीच शांति वार्तालाप सफल बना सके और इन दोनों देशों को शांति बातचीत के लिए झुका सके मान लीजिए पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता कर भी देता है फिर भी यह समझौता तब तक सफल नहीं माना जाएगा जब तक इसमें इसराइल शामिल न हो।

और अभी इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आरिफ के भड़काऊ बयान से पहले ही नाराज है और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के हर बात को खारिज कर रहे हैं ऐसे में यह सीजफायर तभी सफल होगा और तभी इस बातचीत को सफल माना जाएगा जब इस बातचीत में इसराइल भी अपनी पुष्टि देगा और लेबनान पर हमला करना बंद करेगा।

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क्या शांति बातचीत में बाधा आ सकती है ?

पाकिस्तान के राजधानी इस्लामाबाद में हो रहे इस शांति समझौता जिसमें पाकिस्तान अहम भूमिका निभा रहा है इस शांति समझौते में बाधा आने की चांस काफी हद तक दिखाई दे रही है क्योंकि ईरान और अमेरिका के बीच भले ही यह शांति समझौता हो रहा हो मगर इसमें इजराइल का हामी भरना बहुत जरूरी है। जब तक इस शांति समझौते में इसराइल अपनी सहमति नहीं देता तब तक इस समझौते को जीरो माना जाएगा इजराइल का इस समझौते से सीधा कनेक्शन है। क्योंकि ईरान पहले ही बोला था कि जब तक इस समझौते में इसराइल शामिल होकर लेबनान पर हमला बंद नहीं कर देता तब तक कोई वार्ता नहीं होगा।

ईरान का साफ बोलना है कि इसराइल को लेबनान पर हमला बंद करना होगा और तभी जाकर इस सीजफायर का सही संचालन होगा क्योंकि इस सीजफायर में लेबनान भी शामिल है। हालांकि इजराइल का पहले ही बोलना है कि इस सीजफायर में लेबनान शामिल नहीं है और वह लेबनान पर हमला करना बंद नहीं करेगा।

अंततः

इस सब समझौते का मतलब तभी निकलेगा जब द्वितीय पक्क्षदार इसराइल इस बात पर अपनी सहमति जताएगा जब तक इसराइल लेबनान पर हमला नहीं रोकता है। और जब तक लेबनान को सीजफायर का हिस्सा नहीं मानता है तब तक इस शांति समझौते का कोई असर नहीं दिखाई देगा। ईरान और अमेरिका के बीच फंसे पाकिस्तान को तभी सबासी लूटने का मौका मिलेगा जब इस समझौते में इसराइल को शामिल करेगा और जब इसराइल लेबनान पर हमला बंद करेगा

पाकिस्तान खुद को शांति दूत साबित करने के लिए इजरायल के सामने झुकना पड़ेगा और उसको इस सीजफायर के लिए मनाना पड़ेगा तब जाकर बात आगे बढ़ेगा

          — समाप्त —     (The Ashirvad)

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